लखन पटेल सर

लखन पटेल सर

डायरेक्टर

भारत अनेक राज्यों में बंटाहैं।इन राज्यों का विभाजन जिलों में हैं, जनपद और तहसीलों देखे जा सकता हैं और भारतीय आत्मा कहे जाने वाले 6 लाख से अधिक गाँव जहाँ उत्पन्न होती अनगिनत प्रतिमाएँ एक छोटे से गाँव जैतपुर तहसील तेंदूखेड़ा जिला नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) का निवासी अपने छोटे-छोटे सपनों को बड़े आकार देने का मन में विचार उत्पन्न कर रहा था.

आरंभिक जीवन में सरकारी स्कूलों से शिक्षा प्राप्त कर रहा था एक संस्कारवान परिवार से संबंधित जो आमदनी में कम एक कृषक परिवार था लेकिनप्रतिष्ठा औरसंस्कार का धनी था साधारणबुद्धि के कारण इस बालक कोसमाज और संबंधियों में शिक्षा में कम अंक प्राप्त होने के कारण उपेक्षा का शिकार होना पड़ा तब उसके पिता के कारण उसे आत्मबल प्राप्त हुआ परंतु परिस्थितियों ने करवटलीऔर 17 वर्ष की अल्पायु में उसके पिताजी का स्वर्गवास हो गया दादाजी की बीमारी और बड़े भाई के सरलस्वभाव के कारण अचानक उस बालक पर पारिवारिक उत्तरदायित्व आ पड़ा.

दुर्भाग्य से संबंधियों और रिश्ते नातेदारों से सहयोग की अपेक्षा उसे तनाव और अपमान झेलना पड़ा पर उसका विश्वास नहीं हारा था।क्योंकि उसके साथ मातृभूमि का प्रेममाता का विश्वास और उसके बड़े भाई का धैर्य उसके साथ था।उसने ना केवल अपने परिवार के उत्तरदायित्व को संभाला समाज सेवा का बीड़ा भी उठाया, उसके कुछ निकट संबंधियों के साथ घटी दुर्घटनाओं में वह उनका संबल बना.

उसके दोस्तों के लिए ढाल, उसने इतने संघर्ष के बाद भी अपनी पढ़ाई सतत् रूप से जारी रखी और नरसिंहपुर जिले से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर एक महानगर इंदौर की तरफ बड़ा, जहाँ उसेअपनेअस्तित्व की पहचानकरनी थी।

लेकिन परिस्थितियाँ उनके साथ नहीं थी सिविलसेवा के सपने तो लेकर आया था परंतु उन्हें पूरा करने के लिए उसे अनेक उतार चढ़ाव से गुजरना पड़ा बड़े अभाव में रहते हुये उसने अपनी तपस्या प्रारंभ की और ऐसी परिस्थितियों में भी उसका आत्मबल कम नहीं हुआ नाही उसने समाज सेवा का क्षेत्र छोड़ा।उसने ना केवल स्वयं को प्रेरित किया बल्कि अपने साथ रह रहे मित्र की मदद करते हुएउसे प्रेरित कर उस राह की ओर अग्रसर किया जो वर्तमान में उसे एक ईमानदार और लगनशील शिक्षक के रूप में स्थापित करती हैं।
लेकिन अभी उस बालक की यात्रा की शुरूआतही थी अभी अनेक पड़ाव आना बाकी थे।कभी कभार उसे प्रारंभिक अवस्थाओं का अभाव भी सहना पड़ा जो रोटी, कपड़े से संबंधितथी।

लेकिन उसे अपने पैरों पर विश्वास था, जिस पर खड़े होकर उसे सकर तपकरना था।सिविल सेवाओं में लगातार आते बदलाव ने उसके सकट को औरसंघर्षमय बना दिया और 1 या 2 वर्ष में लेकर आये उस सपने से वह दूर जाता रहा।पैसे के अभाव में उसे उचित मार्गदर्शन से वंचित कर दिया और स्वंय के जीवन निर्वाह और महानगर में ठहरने के लिए उसे एक रोजगार का चयन करना पड़ा और उसने शिक्षावृत्ति को अपनाया और अपने प्राप्त ज्ञान का प्रसार करना आरंभ किया यह शायद नियति का ही रचा हुआ खेल था या वह सीढ़ीयाँ जिस पर चलकर उसे अपना मुकाम पाना था।

और अपना सफर उसने आरंभ किया लेकिन फिर भी वह स्वयं को बदल ना सका और उसका उद्देश्य राष्ट्र सेवा या समाज सेवा ही रहा।उसनेअपनी सोच को शक्ति बनाया और धन जोड़ने की अपेक्षा हृदयों को जोड़ना प्रारंभ किया।वह एक संस्थान में, इतिहास, संविधान आदि विषयों के शिक्षक के रूप में अपना कार्य करने लगा, लेकिन जहाँ परिवार की आवश्यताएँ और उसकी जिम्मेदारियाँ उसे खींच रहीथी, वहीं उसका लक्ष्य की लगातार उसे आवाज दे रहा था जहाँ इस दो राहे पर आकार व्यक्ति का चयन, एक ओर जाता हैं।

उसने उन दोनों राहों पर इक साथ सफर किया और पारिवारिक समस्याओं से और जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुये।उन्हें संपूर्ण कियावरन् राष्ट्र निर्माण की ओर भी बढ़ चला, इस शिक्षण कार्य में उसे बड़ी जिम्मेदारी प्राप्तहुयी।और उसे एक संस्थान की शाखा का प्रमुख बना दिया गया लेकिन जहाँ धन और सम्मान दोनों में से एक के चयन का विषय/समय आया तब उसने अपनी विकराल परिस्थितयों ना देख अपने सम्मान को वरीयता दी।और संस्थान के शाखा की प्रमुखता त्यागदी।और पुनः एक साधारण शिक्षक के तौर पर अपने कार्य संपादित करने लगा, इस समय उसने अपने अनेक दोस्तों और स्वयं से जुड़े लोगों को मार्गदर्शित कर उन्हेंन ये रास्ते बनाने और चुनने की प्रेरणादी अपने साथ लोगों का कारवाँ जोड़ता चला गया।

लेकिन अभी भी उसके सपनों और समय के बीच कुछ दूरी थी जिसे उसे तप करना था।और वह अवसर आचुका था उसकी आजाद विचार धारा उन्मुक्तगगन की ओर बढ़ने लगी।और उसने अपने सहयोगियों के साथ एक संस्थान स्थापित किया जो आजाद विचारधारा से परिपूर्ण था।और वह अपने सपने की ओर बढ़ रहाथा, लेकिन अभी भी उसमें आयाम जुड़ना बाकी था, जो उसके तो सिविल सेवा का सपना ना पूरा कर सके लेकिन व्यक्तिगतहित की अपेक्षा अब वह राष्ट्र निर्माण की ओर था।जहाँ वह अपने सपने को अनेक युवा प्रशासनिकअधिकारियों के नेत्रों के माध्यम से देख रहाथा।कभी मार्गदर्शन के अभाव से गुजरे उस व्यक्तित्व ने जहाँ, ज्ञान की प्रति मूर्ति पुस्तकें एवं किताबों का पूजन प्रारंभ करना चाहा था परंतु उसे धनाभाव में वह भी प्राप्त नहीं हो पायी थी।

तब अपनी सोच और स्थापित संस्थान की दृढ़ शक्ति से उसने एक ऐसा सृजन किया जहाँ आनेवाली युवा पीढ़ी उस पुस्तकीय ज्ञान से वंचित ना रह सके।
एक पुस्तकालय की स्थापना की लेकिनउसका आज भी मानना हैं कि अभी तो आगाज हैं अंजाम अभी बाकीहैं।अभी तो नापी हैं मुठ्ठीभर यानी सारा आसमान अभी बाकी हैं।अर्थात अभीभी उसका सफर बाकी हैं।

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